''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Monday, March 17, 2014

''मेरा नाम उनकी जुबान पर है'' ( ग़ज़ल )



मेरा नाम  उनकी  जुबान पर है
जैसे कोई  दरिया  उफ़ान पर है
 
इस बस्ती के लोगों के उसूल मत पूछो
पैर जमीं पे इरादे आसमान पर है
 
वारदाते-क़त्ल उनके शहर में हुई
मगर इल्जाम मुझ सुल्तान पर है
 
हारे हुए सिकंदरों को कौन पूछता है 'हरीश'
फतह के तमाम झंडे मेरे मकान पर है

 मेरा नाम उनकी जुबान पर है
जैसे कोई दरिया उफ़ान पर है......!!

Monday, August 26, 2013

हंसी गुम थी उदास दिख रहा था कुछ कुछ (ग़ज़ल)

कोरे कागज़ पर तू लिख रहा था कुछ कुछ
हंसी गुम थी उदास दिख रहा था कुछ कुछ

खुश तो था कि दुआएं मुकम्मल हुयी थी
फिर भी मन ही मन चिढ़ रहा था कुछ कुछ

थोड़े आंसू गिरे थे मेरे हर सवाल पर
कागज़े दिल तेरा भीग रहा था कुछ कुछ

एक झोंका हवा का गुजर भी गया
सुर्ख पत्ता अभी भी हिल रहा था कुछ कुछ

फ़ासलें मिट रहे थे देखो दूर क्षितिज़ में
जमीं से आसमां मिल रहा था कुछ कुछ

बरसों पहले जो दी थी मुहब्बत की निशानी
वो फुल गुलाब का खिल रहा था कुछ कुछ

बोली लगने से पहले ये हुआ था 'हरीश'
तेरे बाज़ार में मैं बिक रहा था कुछ कुछ 

Wednesday, August 21, 2013

मैंने देखा है मुहब्बत के गुलाबों का अंजाम...(नयी ग़ज़ल)


किसी  रोज़ जिंदगी  बिखर जाएगी
उड़ती पतंगे आसमां से उतर जाएगी

इस ओर कुछ दूरियाँ ज़ायज हैं वर्ना
उस ओर मुहब्बत की खबर जाएगी

मैंने देखा है मुहब्बत के गुलाबों का अंजाम
अश्कों में नहलाकर किताब निगल जाएगी

इस बुढ़ापे में इश्क की ख़ता न करो दोस्त
ज़ात-ऐ-बुजुर्ग बे आबरू होकर जाएगी

गज़लें गाकर देख दिन के उजालों में 'हरीश'
तेरे ख्वाबों में तन्हा मेरी रातें उतर जाएगी

Saturday, August 17, 2013

मेरे गांव के पंछी साँझ को घर नहीं लौटते....(नयी ग़ज़ल)

  नासाज  तबियत थोड़ी  ठीक हो जाय
 आओ  हम  ग़म में चूर चूर  हो जाय

बंजारों से कह दो हम उनसे वाबस्ता नहीं
ये दिन आराम के है तो कुछ आराम हो जाय 

वक़्त कहता है कोई नयी दुनिया बसा ले
तुम जमीं हो जाओ  हम आसमां हो जाय

मेरे गांव के पंछी साँझ को घर नहीं लौटते
जरुरी है तेरे गांव का रिश्ता मेरे गांव से हो जाय

किसी दिन हम भी तेरे गीत गाकर देखेंगे 'हरीश'
फ़िकर नहीं दुनिया दोस्त हो जाय दुश्मन हो जाय

Friday, August 16, 2013

अब परस्तिश ना रही भगवानों की...(उत्सवी ग़ज़ल)

 कभी अपने ख्यालों की मैं सुनता हूँ तो कभी ख्याल मेरी अपनी सुनते है इसी सिलसिले के दरमियाँ आजकल जो हालात मेरे और मेरे ख्यालों के बीच बन पड़े है वो इस 'उत्सवी' ग़ज़ल में पेश करता हूँ...!


अब  परस्तिश ना रही  भगवानों की
तबाह  हुयी तासीर  मेरे  फरमानों की

गफ़लत में इनाद आदमी कर भी ले
अमलन में वो सोच नहीं पशेमानों की

रोज उठकर दर पे स्वागत लिखता हूँ
बेदार  बंदगी  हो  बुजुर्ग  मेहमानों की

तख़्त मिला तोहफे में मैंने कुबूल किया
फिकर मगर ना थी जुल्मी सुल्तानों की

ख़ामोशी से बन बैठे हम ख़फा 'हरीश'
फ़ुर्सत हैं तो  करो  बात बे ज़बानों की...!

Thursday, August 15, 2013

'ज़श्न -ऐ-आज़ादी' से क्या होगा...! (नयी ग़ज़ल)

''कोई कसक दिल में दबी रह गयी ...!'' ऐसे गीत मुझसे गाये नहीं जाते हा मगर दिल के ज़ज्बात अक़सर अल्फाजों की शक्ल-औ-सूरत अख्तियार कर ही लेते है ...मगर यही मेरी बेबसी है और मेरी अनकही आरज़ू भी ...आज मुल्क के हालात के लिए अगर मैं बेबस हूँ तो मेरे अल्फाज़ भी...!
  

 'ज़श्न -ऐ-आज़ादी' से क्या होगा...! (नयी ग़ज़ल)

'ज़श्न -ऐ-आज़ादी' से क्या होगा
अंजुमन-ऐ-गवाही से क्या होगा...
ये गुलिस्ताँ अब क़ुरबानी मांगता है
सिर्फ खूं की निशानी से क्या होगा...
हो कोई ज़िक्र-ऐ-जलवा तो शमशीर उठे
गीत गाती नौजवानी से क्या होगा...
ये पुरानी दीवारों के ढहने का वक़्त है 'हरीश'
महज मरम्मत-ऐ-बाज़ारी से क्या होगा...!!

Saturday, May 26, 2012

चलते-चलते आखिरी सलाम हो जाए...(ग़ज़ल)

इस जिंदगी के नाम इक जाम हो जाये
कुछ रात मयखाने में आराम हो जाये

हम उनसे ये कहकर घर से निकले थे 
इंतजार ना करना चाहे शाम हो जाए 

वो इतना हसीं है की गम न होगा गर
उससे मुहब्बत करके बदनाम हो जाए 

क्यू करे मुहब्बत छुप-छुपकर जहाँ से 
हर राज बेनकाब सरे-आम हो जाए 

इक मुलाकात उनसे जरुरी है 'हरीश'
चलते-चलते आखिरी सलाम हो जाए




इक कसम ऐसी भी अब खा ली जाये (गज़ल)



इक कसम ऐसी भी अब खा ली जाये 
जिससे दोस्ती-दुश्मनी संभाली जाये 

टूटी तस्वीर से आंसू टपकते देखकर 
किसी कलंदर की दुआएं बुला ली जाये 

अब कोई ताल्लुक न रहा उसका मुझसे
हो सके इश्क की अफवाहें दबा ली जाये 

खबर है तूफां जानिबे-समंदर निकले हैं 
वक़्त पर टूटी कश्तियाँ सजा ली जाये 

इन्तजारे-यार की भी हद होती है 'हरीश' 
थकी आँखें इक रात को सुला ली जाये 

Wednesday, May 23, 2012

चाँद भी तेरे हुस्न का गर दीवाना हो जाये (जिन्दा ग़ज़ल)


मुहब्बत का तिलिस्मी अफ़साना हो जाये 
चाँद भी तेरे हुस्न का गर दीवाना हो जाये 

इस नादान दिल को सुकूँ भी मिल जायेगा  
हर रोज तेरा मेरे घर आना जाना हो जाये 

ये लंबा सफ़र है जीने का आखरी सांस तक  
जिंदगी को लम्हों में बांटकर जीना हो जाये 

अब मजे की बात नहीं रही तेरी मुहब्बत में 
हो सके तो तेरा रूठना मेरा मनाना हो जाये 

खुद के साये पर हरगिज़ एतबार न करो 'हरीश' 
अँधेरे में हमें रुकना हो तो ये रवाना हो जाये 

Tuesday, May 22, 2012

मुहब्बत भी एक किस्म की फकीरी है जनाब (ग़ज़ल)

मुहब्बत भी एक किस्म की फकीरी है जनाब
फुरकते-महबूब में तड़पना मझबूरी है जनाब

सूखे पत्तों की खबर अंधड़-तूफानों से पूछिये
बेसहारा जिंदगी की हर सांस आखिरी है जनाब

वो कहते रहे गैरों से दिल की बाते रो-रो कर
जैसे इश्क की बातों में अश्क जरुरी है जनाब

ये चाँद ये सितारे ये जमीं आसमान हर कोई
अहसास की हवा में जिन्दा शरीरी है जनाब

गैरों  के घर का ठिकाना मत पूछिये 'हरीश'
रस्मे-तोहिन इस शहर में अब जरुरी है जनाब



Sunday, May 20, 2012

शायरी-शायरी खेल बनाम शायर का इम्तिहान...

दोस्तों!
ग़ज़ल सूफी फकीरों की दौलत है जो शायरों को विरासत में मिली है। ये जागीर ही ऐसी है जिसे हर कोई अपनी मुहब्बत और गमदीदा माहौल में इस्तेमाल करता है। मुहब्बत-गम और शायरी इस जहाँ की एक अटूट तिगडी है जिसकी खूबसूरती का चर्चा वक़्त की पगडंडियों पर सरे-राह होता रहा है...।
              आज अलसुबह हमारा नादाँ दिमाग एक शरारत कर गया और हमें ये ख्याल दे गया की क्यों न आप जैसे फनकारों के साथ एक अल्फाजों का खेल खेला जाय। यह खेल बिलकूल पाक-साफ़ है। हम आपके समक्ष ग़ज़ल का एक ''मिसरा'' सजाने की गुस्ताखी किये जा रहे है जो निहायत एक खुबसूरत जिंदगी जीने का तलबगार है ।इस मिसरे को उम्मीद है की आपका हुनर इसे ग़ज़ल बन जाने तक की जिंदगी बख्स दे...।
''हुनर  को  इम्तिहानों  तक ले चलो
आशिकों को मयखानों तक ले चलो 
ये मिसरा भी जीने को बेताब सा है दोस्त 
इसे किसी खुबसूरत ग़ज़ल तक ले चलों''
               आपको महज करना ये है कि अपने कमेन्ट में काफ़िया और रदीफ़ का ख्याल रखते हुए अगला मिसरा सुपर्दे-खेल करना है....।
(विशेष सूचना: आपसे विनम्र गुजारिश है की ये दिल को बहलाने का महज एक खेल है जिसे खेल की मानिंद ही खेलना है...अपशब्दों का इस्तेमाल वर्जित है।)
आपकी दिलनवाजी का अभी से ही शुक्रिया...!

ये है वो मिसरा जिसे जिंदगी की तलब है....

............''चाँद भी तेरे हुस्न का गर दीवाना हो जाये''..............




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