''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Wednesday, December 28, 2011

विद्रोह


सवालों का विद्रोह जवाबों से है 
जायज़ फासलों का मंजिलों से है
वो अपने हक की बात करता है अकसर 
जिसका विद्रोह खून के रिश्तों से है
रूक जायेगा अब खुशबूओं का सफ़र
काँटों का विद्रोह आज गुलाबों से है
उसकी गली में मैं जाने से कतराता हूँ
जिसका विद्रोह मुस्कुराहटों से है
मैं अपनी आजादी का बहिष्कार क्यों करूं 'हरीश'
मेरा बहिष्कार तो तेरे बहिष्कारों से है....

मैंने ठोकरें भी किस्तों में खायी है...

आज भी वो शख्स याद आ रहा है
जिससे बिछड़े ये साल जा रहा है
उसका शिकवा वो दूरियों वाला
मेरा बख्शीश-ऐ-बहाना रहा है 
वो खूबसूरत गुनाह इश्क का
आज बेहिसाब सजा पा रहा है
उसका हँसना भी शुकून था हमारा
आज शिकायतों पे रोना आ रहा है
मैंने ठोकरें भी किस्तों में खायी है 'हरीश'
हर सिम्त से इक नया पत्थर आ रहा है...

मेरी जिंदगी.........मेरे कायदें.


मजबूरियों की बंदिशों को मै अपनी ढाल बना के जीता हूँ लोग अकसर खुद अपनी जिंदगी को जीने के तरीकों का मशवरा करतें है मैं नहीं करता....
मेरे अपने कायदें है जिंदगी जीने के मै अपनी धून में जीता हूँ किसी की क्या औकात की मेरे अपने होने में कोई खलल बन जायें...
मेरे हिसाब में रातों की सिर्फ तन्हाई नहीं बादलों की सिर्फ गडगडाहट नहीं आंसूओं की सिर्फ बारिशें नहीं जो है तो बस इतना की रातों की ''खूबसूरत'' तन्हाई है बादलों की ''बुलंद'' गडगडाहट है  और आंसूओं की ''खनकती रिमझिम'' बारिशें है....
जिंदगी की चादर में परेशानियों के छेद तो होने ही है तो क्या चादर ओढना छोड़ दे हड्डियों को बौखला देने वाली नाजायज ठण्ड में...कदापि नहीं, खुशियों और सहूलियतों की सौदागरी मुझे हरगिज़ पसंद नहीं...

Tuesday, December 27, 2011

उल्फत को जागीर की मानिंद खर्च करता हूँ

छोडो भी होती है पुरानी बातें बेक़सूर 
अब क्या तेरा कसूर क्या मेरा कसूर 
वो हर शाम तन्हाई की चादर में होता है
और आंसूओं में आँखें रहती है भरपूर
उल्फत को जागीर की मानिंद खर्च करता हूँ 
क्या करू अपनी फितरत से हूँ मझबूर
कसमों की बंदिशे भी खूब मझेदार होती है 
दो गज फासले का मैखाना भी लगता है दूर 
मुस्कुरातें आशिकों से दर्द की बातें न करो 'हरीश'
लोग कहेंगे भड़काता है और रहता है दूर....

मेरी मर्ज़ी

मेरे विचारों की मासूमियत आज भी मुझे ये हक नहीं बख्स्ती  की मैं अपनी ही तन्हाईयों से परहेज करू, मैं ख्यालों के बिच फ़ासलों में विश्वास हरगिज़ नहीं रखता, मैं ऊँची उड़ानों में विश्वास रखता हूँ .....

वो आज भी मुस्कुराती तो है...

आज भी उन्हें हमारी याद आती तो है,
उन्ही की परछाई उन्हें सताती तो है,
वो लाख चाहे की हमसे दूर रहे,
मगर मन ही मन हमे चाहती तो है...
फासलें है मुसीबतें भी है दिलों के बिच
मगर वो आज भी मुस्कुराती तो है...
बिलखतें आंसूओं में ही सही
जब भी मिलती है बातें करती तो है..
मैं अकसर अपनी मौज में रहता हूँ
वो अकसर अपनी तन्हाई में रहती तो है...
करते है लोग बातें उसकी मुझसे 'हरीश'
और वो खुद से ही अपनी बात करती तो है.....

मैं कब तलक यूँ कब्र के अंधेरों में कैद रहता

ख़ामोशी के साये मेरी तन्हाई को बयां करे है
शाम ढल जाये खुदा चराग-ऐ-दिल दुआ करे है
उसका न कोई ठिकाना बंजारा हुआ जाता है
वह क्या करे बिचारा दर-बदर खुदा करे है
मैं कब तलक यूँ कब्र के अंधेरों में कैद रहता
शुक्र है उसका जो मेरी रिहाई की दुआ करे है
रंगों से न पोत तिरा घर ऐ दुनिया वाले
तू कब तक रहेगा इस घर में जो नया करे है
जाने कितनी गज़लें लिखी है हम पे शायर ने
वैसे हमारी जिंदगी को दो शब्द बयाँ करे है
होकर बेवफा दिल तोड़ने की रस्म निभा लो 'हरीश'
तुम भी वही करो जो हर पल जहां करे है........

हाल-ऐ-दिल इशारों में बयां करता है...

हर शाम चाँद नए चेहरों में सजता है
तेरी याद में चराग नहीं दिल जलता है
मैं खरीदारों की मानिंद खामोश खड़ा हूँ
तेरी मुहब्बत का बाज़ार जहाँ लगता है
तमाम उम्र जो अपने साये के पीछे चला है
मंजिल पे आके आज अपने साये से डरता है
हालात ही
ऐसे है की वो छत पे आकर
हाल-ऐ-दिल इशारों में बयां करता है
शीशे के घरों में रहकर भी 'हरीश'
रह-रह कर रेत के घरोंदों की बात करता है....

बेमौत मरने वालों की आवाज़ ...

आज मेरे यार की फिर याद आयी
हर सहर के बाद आखिर शाम आयी
जब जनाज़ा चल पड़ा उसका गली से
तब खुदा के पास उसकी आखिरी फरियाद आयी
यार की जुदाई ने थी मुस्कुराहट छीन ली
खुल के हंसी आज मुझको एक अरसे बाद आयी
रात की ख़ामोशी में ही हर सड़क हर मोड़ पे
शहर में बेमौत मरने वालों की आवाज़ आयी
खुशनुमा आँखों से उनके आंसू बहते देखकर
हर जुबान पे ऐ 'हरीश' तेरे घर की बात आयी...

रोयेंगे हम फिर बहुत...

रोयेंगे हम फिर बहुत रात छा जाने दो
पल दो पल अब तो हमे मुस्कुराने दो
खुल के करेंगे बातें तुमसे मेरे यारों
दिल को लगी है ठेस उसे छुपाने दो
ख़ामोशी से रात तो गुजार देंगे मगर
पहले दर्द-ऐ-दिल को जरा सुलाने दो
सब बता देंगे जो दिल पे गुजरी है
पहले हमे तसल्ली से आंसू बहाने दो
जिंदगी की धुप में जाने से पहले 'हरीश'
छांव में बैठकर जरा हौंसला बढाने दो ....

जो शहर में हुआ हंगामा चिल्लाता क्या है

जो शहर में हुआ हंगामा चिल्लाता क्या है
दिल कोई आज टूटा होगा तेरा जाता क्या है
मैखाने में ही गुजारी है मैंने तमाम जिंदगी
रह-रह कर आज मुझे पिलाता क्या है
मुझे दुआ न दो ऐ मेरे शहर के वाशिंदों
मैं जो बिखर जाऊ तुम्हारा जाता क्या है
ऐ मेरे साये तू कब तलक मेरे साथ चलेगा
आखिर तेरा मेरे साथ नाता क्या है
हो गया है उसका नाम घर-घर 'हरीश'
आज उसकी वफ़ा की खबर लाता क्या है....

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