''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Tuesday, December 27, 2011

मैं कब तलक यूँ कब्र के अंधेरों में कैद रहता

ख़ामोशी के साये मेरी तन्हाई को बयां करे है
शाम ढल जाये खुदा चराग-ऐ-दिल दुआ करे है
उसका न कोई ठिकाना बंजारा हुआ जाता है
वह क्या करे बिचारा दर-बदर खुदा करे है
मैं कब तलक यूँ कब्र के अंधेरों में कैद रहता
शुक्र है उसका जो मेरी रिहाई की दुआ करे है
रंगों से न पोत तिरा घर ऐ दुनिया वाले
तू कब तक रहेगा इस घर में जो नया करे है
जाने कितनी गज़लें लिखी है हम पे शायर ने
वैसे हमारी जिंदगी को दो शब्द बयाँ करे है
होकर बेवफा दिल तोड़ने की रस्म निभा लो 'हरीश'
तुम भी वही करो जो हर पल जहां करे है........

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अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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