''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Friday, December 30, 2011

वाह! शब्दों की तू-तू मैं-मैं,और ग़ज़ल बन गयी/ ''मैंने यूँही बेशकीमती मुहब्बत फोकट में गवा दी...''


ये शिकवा है मेरा खुदा से की तू खुदा क्यों है ?
मेरी दुआओं का क़त्ल करने पे आमादा क्यों है?

मुझ फकीर ने बहाई है नदियाँ बेहिसाब सजदों की 
तेरी बख्शीशों का समंदर मगर आधा क्यों हैं ?

उसूलों की बैशाखियों का नक़द खरीदार हूँ मैं 
तेरे बाज़ार में अब उधारी का सौदा क्यों है ?


मैंने यूँही बेशकीमती मुहब्बत फोकट में गवा दी 
फिर आशिकों से आंसूओं का तेरा वादा क्यों है? 


मसलों के जनाजें गर तेरे कंधों पे नहीं उठते 'हरीश'
तो सब्र कर,औरों को भी आने दे,चिल्लाता क्यों है?


ये शिकवा है मेरा खुदा से की तू खुदा क्यों है...?
मेरी दुआओं का क़त्ल करने पे आमादा क्यों है...?

ये 'पंचों' की चतुराई है या अनाड़ीपन...


आज मैंने जाना धुत्कार क्या होती है, अंधापन क्या होता है, क्या होता है अनाड़ीपन?
आज मेरी आँखों ने जो खून के रिश्तों की बेबसी देखी वो किसी जादूगरी से कम न थी। एकाएक समझदारों का झूंड अनाड़ीपन पे उतर आया। और क्यों न उतरे सच तो सीता की अग्नि परीक्षा में ही जल चूका था। बरसों बीत गये आज तक सच नहीं दिखा और झूठ है की कुलांचें भर रहा है इंसानियत के खेत में, इसी विश्वास के साथ की कोई तो राम बन के आये और पवित्रता का हरण हो। मेरे समाज के तथाकथित ''पंच'' गांव की चौपाल पर किसी संत की मानिंद खड़े बरगद के पेड़ के निचे प्रपंच करते है ''पंचायती'' नहीं करते। ये आज जान के मुझे हैरानी तो हुयी मगर चुप था क्योकि मैं गैरहाजिर था खुद से। एक से जब मैंने पूछा की ''समाज की एकता'' क्या होती है? ''सच का साथ'' क्या है?. बड़ा मझेदार जवाब मिला मुझे उसने कहा ये दोनों तो ''पति-पत्नी'' थे एक अरसा बीत गया समाज के ठेकेदारों ने इन्हें तो गांव-निकाला दे दिया...! अब तो  इनके बारे में बात करना भी इस गांव के पंचों ने ''जुर्म'' घोषित कर रखा है। लगता है आप इस गांव से नहीं हो।आपका भला इसी में है की इस गांव से जल्दी से फूट लो वरना यहाँ का रिवाज सात्विक जुबान काटने का है। मैं भी डर गया जल्दी से खुद को समेटा और ''फूट'' लिया।

Thursday, December 29, 2011

मैंने झूठ के पैर देखे है...


मैंने झूठ के पैर देखे है
सत्य के नकाब में 
चलते देखा है झूठ को दौड़ते देखा है
खुदा की बेकुसूरी पर 
मस्जिदों की दीवारों को 
फकीरों ने सिसकते देखा है।
मैंने साँझ के वक़्त 
कसमों की फटी चादर में 
बुढ़िया को ठण्ड से ठिठुरते देखा है।
पुजारीओं की प्रार्थनाओं में 
लोगों की खुशहाली को
बेबस कुचलते देखा है ।
मैंने झूठ के पैर देखे है 
सत्य के नकाब में 
चलते देखा है झूठ को दौड़ते देखा है....।

ये मेरे रास्तें है...

मैं आज भी
मेरी मंजिलों के बिच
आने वाले पत्थरों पे
तिलक लगाता हूँ, 
सर झुकता हूँ , 
सजदा करता हूँ... 
पहुंचे हुए पीरों की दुत्कारों ने 
मुझे वो रास्तें दिखाएँ है
जिनपर अकसर लोग नहीं जाते 
जहाँ मंजिलें खो जाती है 
अनायास 
पहाड़ों के पार,
नदियों के शालीन मोड़ों पर, 
ये मेरे रास्तें है 
जिनकी मंजिलों से थोड़ी कम बनती है...।

Wednesday, December 28, 2011

कोई नया तराना कोई नयी ग़ज़ल गायें....

सुबह की पहली किरण न जाने क्यों मुझ पर एतबार नहीं करती न जाने क्यों मेरी दुआएं कुबूल नहीं करती...
मैं नहीं चाहता की कोई बेहोशी में जिए मैं नहीं चाहता कोई घुप्प अंधेरों में खो जायें  मैं चाहता हूँ कोई तो हो जो  फूलों पर बिखरी शबनम इकट्ठी करे कोई नया तराना कोई नयी ग़ज़ल गायें....

गुनाहों को सबूतों में बाँट रखा है

अपनों को रिश्तों में बाँट रखा है
गुनाहों को सबूतों में बाँट रखा है 

वक़्त की पाबंदियां मजबूरों के लिए है
मैंने वक़्त को लम्हों में बाँट रखा है....
उसकी दिलेरी के किस्से बड़े मशहूर है
जिसने समंदर को बारिशों में बाँट रखा है...
मैं नादान था जो ख्वाबों को उधारी में देखा
अब लौटाने है तो किस्तों में बाँट रखा है..
मंजिलों के रास्तें अब मुझसे तय नहीं होते
दूरियों को मैंने पगडण्डीओं में बाँट रखा है

लम्हों का पागलपन

शब्दों की टूटी बैशाखी पर
वो आज भी तय करता है
मीलों की दूरियां
मौसमों की लापरवाही
बेफिक्री में उडाता
वो आज भी गीत गाता है
बरसातों के
बेशक बांसूरी की धून भी साथ नहीं देती
उसके अकेलेपन में
फिर भी
लम्हों का पागलपन
उससे देखा नहीं जाता...

शब्दों की पहरेदारी में मेरे विचारों के किले है

''जिंदगी जीने के नुस्खों में मुझे ऐतबार नहीं है मैं अपनी जिंदगी बहिस्कारों के साये में जीने की कोशिश करता हूँ...''

''मेरे पास ऐसे शब्दों की जागीर है जिनसे गज़लें नहीं बनती उनसे तो सिर्फ हमदर्दी की लाइलाज महामारी फैलती है''

''मुझसे औरो के दर्द देखे नहीं जाते..फटी चादर में मैंने लोगो को जिंदगी के सपने बुनते देखा है''


''मेरी मुस्कराहट मेरे होंठों पे ये इलज़ाम लगा बैठी है कि वक़्त -बेवक़्त ये बदमाश मेरा इस्तेमाल क्यों करते है..''


''मैं उसकी बेवफाई की हिफाजत आज भी उसी मुद्दत से करता हूँ जैसी मैं अपनी वफ़ा की हिफाजत उसके मेरे साथ होने पर करता था ।''


''बिलखती आँखों के ख्वाब धुल जाते है रुसवाई के कोहरे में आशीर्वादों के दरख्त भी ढक जाते है।''


''हाथों की लकीरों पे मुझे बस इतना ही एतबार है जितना किसी कलंदर को खुदा पे एतबार होता है...।''


''जिंदगी को खूबसूरती से जीने की कला जिस शख्स को आ गयी उसके ख्वाब तो खुदा भी देखा करता है...''


''मैं आशिकी की नसीहतें किसी को नहीं देता लोग खुद संभल नहीं पाते मेरी नसीहतों को क्या खाक संभालेंगे..।'' 

''मैं आज भी इसी उम्मीद में जिए जा रहा हूँ की कही तू मुझे याद करे तो तेरे ख्यालों में आ सकू.....''

''मेरे विचारों की मासूमियत आज भी मुझे ये हक नहीं बख्स्ती की मैं अपनी ही तन्हाईयों से परहेज करू मैं ख्यालों के बिच फ़ासलों में विश्वास हरगिज़ नहीं रखता...मैं ऊँची उड़ानों में विश्वास रखता हूँ .....''

''वो इतने आसानी से कहा मानने वाले थे...आखिर मुझे अपनी ख्वाहिशो का क़त्ल करना ही पड़ा...''

परम्पराओं का पुजारी...


परम्पराओं के पुजारी को
देखा है मैंने
बहिष्कारों की घंटियाँ बजातें
जुलूसों के दिए जलाते 
मंदिर में
वो रहता है अकसर
गुमसुम 
शांतचित्त
ये जानते हुए भी कि
शब्दों के नगाड़े 
निहायत जरुरी है
सुबह कि आरती में
फिर भी 
मौन है, चुप है
शायद शिकायत है उसकी
भगवान से
कि अभी तक
ऊब क्यों नहीं गये
घंटियों के शोर से...

विद्रोह


सवालों का विद्रोह जवाबों से है 
जायज़ फासलों का मंजिलों से है
वो अपने हक की बात करता है अकसर 
जिसका विद्रोह खून के रिश्तों से है
रूक जायेगा अब खुशबूओं का सफ़र
काँटों का विद्रोह आज गुलाबों से है
उसकी गली में मैं जाने से कतराता हूँ
जिसका विद्रोह मुस्कुराहटों से है
मैं अपनी आजादी का बहिष्कार क्यों करूं 'हरीश'
मेरा बहिष्कार तो तेरे बहिष्कारों से है....

मैंने ठोकरें भी किस्तों में खायी है...

आज भी वो शख्स याद आ रहा है
जिससे बिछड़े ये साल जा रहा है
उसका शिकवा वो दूरियों वाला
मेरा बख्शीश-ऐ-बहाना रहा है 
वो खूबसूरत गुनाह इश्क का
आज बेहिसाब सजा पा रहा है
उसका हँसना भी शुकून था हमारा
आज शिकायतों पे रोना आ रहा है
मैंने ठोकरें भी किस्तों में खायी है 'हरीश'
हर सिम्त से इक नया पत्थर आ रहा है...

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