''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Wednesday, December 28, 2011

कोई नया तराना कोई नयी ग़ज़ल गायें....

सुबह की पहली किरण न जाने क्यों मुझ पर एतबार नहीं करती न जाने क्यों मेरी दुआएं कुबूल नहीं करती...
मैं नहीं चाहता की कोई बेहोशी में जिए मैं नहीं चाहता कोई घुप्प अंधेरों में खो जायें  मैं चाहता हूँ कोई तो हो जो  फूलों पर बिखरी शबनम इकट्ठी करे कोई नया तराना कोई नयी ग़ज़ल गायें....

4 comments:

  1. शबनम इकठ्ठा कर सिरहाने छुपा रखा है , कभी गीत, कभी कविता ,,,लिख जाती हूँ

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  2. शुक्रिया..! हम भी ऐसे ही है रश्मि जी छुप छुप के लिखने की कोशिश करते रहते है...

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  3. जब कवि बने तो डरना क्या ,छुप छुप कर लिखना क्या ......

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  4. गैरों की नज़र लग सकती थी मेरे हुनर को सुनील जी अगर पर्दा न करता....
    शुक्रिया आपके अनमोल कमेन्ट के लिए....!!!

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अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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