''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

Recent News

LATEST:

Friday, August 16, 2013

अब परस्तिश ना रही भगवानों की...(उत्सवी ग़ज़ल)

 कभी अपने ख्यालों की मैं सुनता हूँ तो कभी ख्याल मेरी अपनी सुनते है इसी सिलसिले के दरमियाँ आजकल जो हालात मेरे और मेरे ख्यालों के बीच बन पड़े है वो इस 'उत्सवी' ग़ज़ल में पेश करता हूँ...!


अब  परस्तिश ना रही  भगवानों की
तबाह  हुयी तासीर  मेरे  फरमानों की

गफ़लत में इनाद आदमी कर भी ले
अमलन में वो सोच नहीं पशेमानों की

रोज उठकर दर पे स्वागत लिखता हूँ
बेदार  बंदगी  हो  बुजुर्ग  मेहमानों की

तख़्त मिला तोहफे में मैंने कुबूल किया
फिकर मगर ना थी जुल्मी सुल्तानों की

ख़ामोशी से बन बैठे हम ख़फा 'हरीश'
फ़ुर्सत हैं तो  करो  बात बे ज़बानों की...!

Thursday, August 15, 2013

'ज़श्न -ऐ-आज़ादी' से क्या होगा...! (नयी ग़ज़ल)

''कोई कसक दिल में दबी रह गयी ...!'' ऐसे गीत मुझसे गाये नहीं जाते हा मगर दिल के ज़ज्बात अक़सर अल्फाजों की शक्ल-औ-सूरत अख्तियार कर ही लेते है ...मगर यही मेरी बेबसी है और मेरी अनकही आरज़ू भी ...आज मुल्क के हालात के लिए अगर मैं बेबस हूँ तो मेरे अल्फाज़ भी...!
  

 'ज़श्न -ऐ-आज़ादी' से क्या होगा...! (नयी ग़ज़ल)

'ज़श्न -ऐ-आज़ादी' से क्या होगा
अंजुमन-ऐ-गवाही से क्या होगा...
ये गुलिस्ताँ अब क़ुरबानी मांगता है
सिर्फ खूं की निशानी से क्या होगा...
हो कोई ज़िक्र-ऐ-जलवा तो शमशीर उठे
गीत गाती नौजवानी से क्या होगा...
ये पुरानी दीवारों के ढहने का वक़्त है 'हरीश'
महज मरम्मत-ऐ-बाज़ारी से क्या होगा...!!

Saturday, May 26, 2012

चलते-चलते आखिरी सलाम हो जाए...(ग़ज़ल)

इस जिंदगी के नाम इक जाम हो जाये
कुछ रात मयखाने में आराम हो जाये

हम उनसे ये कहकर घर से निकले थे 
इंतजार ना करना चाहे शाम हो जाए 

वो इतना हसीं है की गम न होगा गर
उससे मुहब्बत करके बदनाम हो जाए 

क्यू करे मुहब्बत छुप-छुपकर जहाँ से 
हर राज बेनकाब सरे-आम हो जाए 

इक मुलाकात उनसे जरुरी है 'हरीश'
चलते-चलते आखिरी सलाम हो जाए




इक कसम ऐसी भी अब खा ली जाये (गज़ल)



इक कसम ऐसी भी अब खा ली जाये 
जिससे दोस्ती-दुश्मनी संभाली जाये 

टूटी तस्वीर से आंसू टपकते देखकर 
किसी कलंदर की दुआएं बुला ली जाये 

अब कोई ताल्लुक न रहा उसका मुझसे
हो सके इश्क की अफवाहें दबा ली जाये 

खबर है तूफां जानिबे-समंदर निकले हैं 
वक़्त पर टूटी कश्तियाँ सजा ली जाये 

इन्तजारे-यार की भी हद होती है 'हरीश' 
थकी आँखें इक रात को सुला ली जाये 

Wednesday, May 23, 2012

चाँद भी तेरे हुस्न का गर दीवाना हो जाये (जिन्दा ग़ज़ल)


मुहब्बत का तिलिस्मी अफ़साना हो जाये 
चाँद भी तेरे हुस्न का गर दीवाना हो जाये 

इस नादान दिल को सुकूँ भी मिल जायेगा  
हर रोज तेरा मेरे घर आना जाना हो जाये 

ये लंबा सफ़र है जीने का आखरी सांस तक  
जिंदगी को लम्हों में बांटकर जीना हो जाये 

अब मजे की बात नहीं रही तेरी मुहब्बत में 
हो सके तो तेरा रूठना मेरा मनाना हो जाये 

खुद के साये पर हरगिज़ एतबार न करो 'हरीश' 
अँधेरे में हमें रुकना हो तो ये रवाना हो जाये 

Tuesday, May 22, 2012

मुहब्बत भी एक किस्म की फकीरी है जनाब (ग़ज़ल)

मुहब्बत भी एक किस्म की फकीरी है जनाब
फुरकते-महबूब में तड़पना मझबूरी है जनाब

सूखे पत्तों की खबर अंधड़-तूफानों से पूछिये
बेसहारा जिंदगी की हर सांस आखिरी है जनाब

वो कहते रहे गैरों से दिल की बाते रो-रो कर
जैसे इश्क की बातों में अश्क जरुरी है जनाब

ये चाँद ये सितारे ये जमीं आसमान हर कोई
अहसास की हवा में जिन्दा शरीरी है जनाब

गैरों  के घर का ठिकाना मत पूछिये 'हरीश'
रस्मे-तोहिन इस शहर में अब जरुरी है जनाब



Sunday, May 20, 2012

शायरी-शायरी खेल बनाम शायर का इम्तिहान...

दोस्तों!
ग़ज़ल सूफी फकीरों की दौलत है जो शायरों को विरासत में मिली है। ये जागीर ही ऐसी है जिसे हर कोई अपनी मुहब्बत और गमदीदा माहौल में इस्तेमाल करता है। मुहब्बत-गम और शायरी इस जहाँ की एक अटूट तिगडी है जिसकी खूबसूरती का चर्चा वक़्त की पगडंडियों पर सरे-राह होता रहा है...।
              आज अलसुबह हमारा नादाँ दिमाग एक शरारत कर गया और हमें ये ख्याल दे गया की क्यों न आप जैसे फनकारों के साथ एक अल्फाजों का खेल खेला जाय। यह खेल बिलकूल पाक-साफ़ है। हम आपके समक्ष ग़ज़ल का एक ''मिसरा'' सजाने की गुस्ताखी किये जा रहे है जो निहायत एक खुबसूरत जिंदगी जीने का तलबगार है ।इस मिसरे को उम्मीद है की आपका हुनर इसे ग़ज़ल बन जाने तक की जिंदगी बख्स दे...।
''हुनर  को  इम्तिहानों  तक ले चलो
आशिकों को मयखानों तक ले चलो 
ये मिसरा भी जीने को बेताब सा है दोस्त 
इसे किसी खुबसूरत ग़ज़ल तक ले चलों''
               आपको महज करना ये है कि अपने कमेन्ट में काफ़िया और रदीफ़ का ख्याल रखते हुए अगला मिसरा सुपर्दे-खेल करना है....।
(विशेष सूचना: आपसे विनम्र गुजारिश है की ये दिल को बहलाने का महज एक खेल है जिसे खेल की मानिंद ही खेलना है...अपशब्दों का इस्तेमाल वर्जित है।)
आपकी दिलनवाजी का अभी से ही शुक्रिया...!

ये है वो मिसरा जिसे जिंदगी की तलब है....

............''चाँद भी तेरे हुस्न का गर दीवाना हो जाये''..............



Friday, May 18, 2012

खुबसूरत हो तुम (ग़ज़ल)


नकाब में हुस्न की मूरत हो तुम
रंगे-खुशबू सी खुबसूरत हो तुम
जिंदगी की बेनजीर जागीर हो 
किसी गरीब की दौलत हो तुम 
हो उजली ठंडी बूंद बारिश की 
बंजर जमीं की जरुरत हो तुम 
बुरा मानने का जिक्र क्यों करूं
मीठी-मीठी सी शरारत हो तुम 
दर्द का दरिया सुकूं का साहिल 
कश्ती में बिखरी मुहब्बत हो तुम 
जुल्फों के साये में खुशबू के घर
चांदे-पूनम सी खुबसूरत हो तुम 
यूँ कैसे भुला दूं तुम्हे मैं  'हरीश'
रूठी ही सही मेरी किस्मत हो तुम

उसका रूठ जाना तबाही से कम नहीं (ग़ज़ल)

उसका  रूठ  जाना  तबाही से कम नहीं
लिबासे-ख़ामोशी झूठी गवाही से कम नहीं

अब न रोना है उसका  न खिलखिलाना
वो गुजरे लम्हे भी  शायरी से कम नहीं

तमाम उम्र भी कम है  शिकवों के लिए
जिंदगी के शिकवे  जिंदगी से कम नहीं

पंछी  भी उड़ते-उड़ते  दम तोड़ देते है
आसमां की कीमत  जमीं से कम नहीं

अकसर वही बात  लोग किया करते है
जो मुहब्बत की  कहानी से कम नहीं

ख्वाब में खुदा भी मुझसे कह गया'हरीश'
मेरी बंदगी भी   तेरी बंदगी से कम नहीं

Thursday, May 17, 2012

जिन्दा हूँ मगर आज भी गम के लिबास में (ग़ज़ल)

जिन्दा हूँ मगर आज भी गम के लिबास में 
बिखरी हुई कहानियाँ जिस्मे-अलफ़ाज़ में 

आखिरी ख्वाहिश ये मेरी नाम-ऐ-साकी है 
तमाम  ईंट-ऐ-कब्र  नहला  दो  शराब में

न जाने किसके गले से आगाज़-ऐ-क़त्ल हो 
बेहिसाब फिक्रमंद है लोग बिखरी कतार में

बदनामियों का डर महज  उनको ही होगा
वे अजनबी जो ठहरे है मेरे घर के पास में 

ख़त्म हो भी तो कैसे हो परेशानियां  'हरीश'
हर  सवाल  गमदिदा है  तेरे हर  जवाब में 

Saturday, May 12, 2012

जिंदगी जीने के जो आसां तरीके है (इक नादाँ ग़ज़ल)


जिंदगी जीने के जो आसां तरीके है 
मौत की चौखट पे मुद्दतों से सीखे है 

तू ही था जिस पर मुझे नाजिश था कभी 
आज तेरे ख्याल भी खामोश फीके है 

होश में रहना गज़ब हुनर की बात है 
इश्क की शराब जो हम पी के बैठे हैं 

परेशाँ है बादशाहों के महल घर-बार  
बेफिक्र चैन-औ-सुकूँ से फकीर लेटे है 

क्या खूब सीखा हैं सलीका बंदगी का ऐ' हरीश' 
महबूब के पैरों की धूल सर पर उन्डेले है 

नाजिश =गर्व


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
Blogger Wordpress Gadgets