''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Friday, May 18, 2012

खुबसूरत हो तुम (ग़ज़ल)


नकाब में हुस्न की मूरत हो तुम
रंगे-खुशबू सी खुबसूरत हो तुम
जिंदगी की बेनजीर जागीर हो 
किसी गरीब की दौलत हो तुम 
हो उजली ठंडी बूंद बारिश की 
बंजर जमीं की जरुरत हो तुम 
बुरा मानने का जिक्र क्यों करूं
मीठी-मीठी सी शरारत हो तुम 
दर्द का दरिया सुकूं का साहिल 
कश्ती में बिखरी मुहब्बत हो तुम 
जुल्फों के साये में खुशबू के घर
चांदे-पूनम सी खुबसूरत हो तुम 
यूँ कैसे भुला दूं तुम्हे मैं  'हरीश'
रूठी ही सही मेरी किस्मत हो तुम

5 comments:

अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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