''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Thursday, May 17, 2012

जिन्दा हूँ मगर आज भी गम के लिबास में (ग़ज़ल)

जिन्दा हूँ मगर आज भी गम के लिबास में 
बिखरी हुई कहानियाँ जिस्मे-अलफ़ाज़ में 

आखिरी ख्वाहिश ये मेरी नाम-ऐ-साकी है 
तमाम  ईंट-ऐ-कब्र  नहला  दो  शराब में

न जाने किसके गले से आगाज़-ऐ-क़त्ल हो 
बेहिसाब फिक्रमंद है लोग बिखरी कतार में

बदनामियों का डर महज  उनको ही होगा
वे अजनबी जो ठहरे है मेरे घर के पास में 

ख़त्म हो भी तो कैसे हो परेशानियां  'हरीश'
हर  सवाल  गमदिदा है  तेरे हर  जवाब में 

4 comments:

  1. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

    ReplyDelete
  2. हर सवाल ग़मदिदा है..
    बेहद खूबसूरत!

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  3. आप सभी साहित्य प्रेमियों को मेरा तहे-दिल से शुक्रिया @ प्रसन्न जी @ शेखर जी @ मधुरेश जी...

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अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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