''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Saturday, May 12, 2012

नफरतों की गुस्ताखी (ख्वाबों से बनी गजल)



जिंदगी के मसलों की ज़ीनत जरुरी है 
जागीरे-बख्शीस की कीमत जरुरी है...

नफरतों की गुस्ताखी हर रोज करता हूं
मुहब्बत करने को तो फुर्सत जरुरी है... 

जंग का मैदान जख्मे-जमीं हो गया 
अब अमनौ-चैन की हरकत जरुरी है...

आँख का मतलब नहीं हर वक़्त रोया जाय 
अश्क की बारिश को फुरकत जरुरी है... 

मुहब्बत का खेल तू न खेल पायेगा'हरीश'
इस हुनर के खेल में शौहरत जरुरी है...


जिंदगी के मसलों की ज़ीनत जरुरी है 
जागीरे-बख्शीस की कीमत जरुरी है...

Thursday, May 10, 2012

बेक़सूर निगाहों के मसलें (ग़ज़ल)

बेक़सूर निगाहों के मसलें चश्मदीद गवाह हो गये 
हम इतना डूबे उसकी चाहत में कि दरिया हो गये 

मुहब्बत की बाँहों में सिसककर गम शुकून पाता है 
अश्कों में नहाकर बेआबरू  तमाम शिकवा हो गये

 एक बार जो उसकी खैर ली तो वो लिपट के रो पड़ा 
बातों बातों में हम भी गमे-यार के हिस्सेदार हो गये 

हर पत्थर को खंगालने की जब-जब भी चली है बात 
जाने क्यूँ बेबुनियाद मेरे शहर के मकां परेशां हो गये 

अकसर सूखे पत्ते उसी सिम्त फेंक दिए जाते है'हरीश'
जिस किसी सिम्त रवाना अश्कियाँ तूफां हो गये...!

Wednesday, May 9, 2012

खुशबू का आलम जारी है (ट्विटर पर लिखी मेरी ग़ज़ल)



तुझसे बेपनाह मुहब्बत की ये कारगुजारी है 
नादाँ बस्ती में जनाजा-ऐ-महबूब की तैयारी है 

तुझे भूल भी जाऊं मगर आज ये हालात है मेरे 
बिखरी जुल्फों में भी खुशबू का आलम जारी है 

बेफिक्र बस्ती में इक फकीर धुनी तपा के बैठ गया 
बेसुध खुदा को पाने की उसकी पुरजोर तैयारी है 

कुछ न कहना उसे वो हर बात का बुरा मानती है 
वो गज़ब की बेशकीमती है वो खुदा की दुलारी है 

खेल-ऐ-मुहब्बत में खबरदारी भी जरुरी है 'हरीश'
इसमे जीत भी करारी है इसमे हार भी करारी है 

Tuesday, May 8, 2012

एक कहानी ऐसी हो (ऐतिहासिक ग़ज़ल)


कोरे पन्नों की किस्मत में एक कहानी ऐसी हो
इतिहासों के सर पर मढ़ते इल्जामों के जैसी हो

ये तब्दिली का मौसम है तब्दिली के बादल हैं
तेरी मेरी सबकी कोशिश ऊजले सावन जैसी हो

बूढी रस्मे तोड़ फेंकना इतना मेरा मकसद है
तेरे मकसद की सूरत भी मेरे मकसद जैसी हो

तड़फ रहा है मुल्क ये अपना जंजीरों के पाशो में
हर जंजीर पर चोट भी गहरी लोहारों के जैसी हो

जुल्मों के साये में जीना बीते कल की बाते है
'हरीश' क्रांति की तैयारी उड़ते बाजों जैसी हो....



Monday, May 7, 2012

तू मेरा अपना सा लगे है (ग़ज़ल)



तेरा कूँचा-ऐ-शहर भी मेरा अपना सा लगे है
क्यों रहूँ तन्हा जब  तू मेरा अपना सा लगे है  

गुजरे ज़माने की बातें सलीके से क्या करनी 
जब ये वारदातों का जमाना अपना सा लगे है 

हर रात चरागों से गुफ्तगू का आलम जारी है 
पतंगों का जानलेवा इश्क मेरा अपना सा लगे है 

एक बारगी तुझसे टूट के मुहब्बत भी कर लूं' हरीश'
मगर तन्हाई ये मंजर-ऐ-अश्क मेरा अपना सा लगे है


तेरा कूँचा-ऐ-शहर भी मेरा अपना सा लगे है
क्यों रहूँ तन्हा जब  तू मेरा अपना सा लगे है ...!

Sunday, May 6, 2012

मजा आ जाये (ग़ज़ल)

कुछ तो हो बहाना कि मजा आ जाये
गर तू हो करीब मेरे मजा आ जाये 

ये कोलाहल ये बेहिसाब शोर-शराबा 
शहर में हो कोई गांव मजा आ जाये 

मेरे जनाजे को सजाने से पहले उसे 
मेरी कसम याद दिला दो मजा आ जाये

तेरी नज़रों से दूर चला भी जाऊं चुपचाप                  
एक बारगी तू कह दे तो मजा आ जाये 


अब और कितना उसे याद करूं 'हरीश'
रफ्ता-रफ्ता भूल ही जाऊं मजा आ जाये 

कुछ तो हो बहाना कि मजा आ जाये
गर तू हो करीब मेरे मजा आ जाये...!

Saturday, May 5, 2012

जुगनुओं की तरह जला जाये (ग़ज़ल)

तेरे हुस्न का किस्सा तेरा कातिल सुना जाये,
बात गर मजे की है बेबाक कुछ तो कहा जाये...!

गैरों के घरों में अपने लोग भी नजर आ जाते हैं 
गली से गुजरते हुए गर बेखौफ झाँका जाये...!

खुद मंजिलें अपनी और लौट सकती है अगर 
अँधेरे सफ़र में भी जुगनुओं की तरह जला जाये...!

ता-उम्र मेरी ये ख्वाहिश जिन्दा रहेगी 'हरीश'
रूठ जाये गर दुनिया तो मुझसे ना रूठा जाये...!

तेरे हुस्न का किस्सा तेरा कातिल सुना जाये
बात गर मजे की है बेबाक कुछ तो कहा जाये...!

Friday, May 4, 2012

तुझे नज़रंदाज़ कर लूं ( ग़ज़ल)

  ये मुमकिन तो है की तुझे नज़रंदाज़ कर लूं 
  खफा हो जाऊ कभी खुद से कभी माफ़ कर लूं 

  तेरी दबी आवाज़ भी सुने एक अरसा बीत गया 
  हो हुनर तो तेरी आवाज़ को मेरी आवाज़ कर लूं 

  किस्से मशहूर है लोगो की जुबानी मेरे दिल के
  गर बस में होता तो हर किस्से पे ईनाम कर लूं

आज फिर कोई गुमनाम बस्ती में लौट आया हैं 'हरीश'
 बिखर के चरणों में गिरुं या पहले आदाब कर लूं


  ये मुमकिन तो है की तुझे नज़रंदाज़ कर लूं 
  खफा हो जाऊ कभी खुद से कभी माफ़ कर लूं 

Wednesday, May 2, 2012

वक़्त मिले गर तो (नयी ग़ज़ल)

वो ग़मज़दा है मगर मुसकुरा के बात करता है
ये उसका सलीका हैं सलीके से बात करता है ...

न जाने क्यूँ वक़्त कमबख्त ठहर जाता है 
वो जब भी मिलता है कुछ करामात करता है ...

मैंने बंजर जमीं में गुलाबों की फसल बोई है 
दरियादिल है तू जो बेवक़्त बरसात करता है ...

वक़्त मिले गर तो खुदा से मुहब्बत भी कर लूं 'हरीश' 
ये बात और है कि वो मुझसे मुहब्बत दिन-रात करता है...

वो ग़मज़दा है मगर मुसकुरा के बात करता है
ये उसका सलीका हैं सलीके से बात करता है ...

Sunday, April 29, 2012

मैं अकसर देख आया हूँ (ग़ज़ल)

मैं रोते हुए बेबाक चन्द मंजर देख आया हूँ 
संभलते हुए बेहिसाब लश्कर देख आया हूँ 

काजल से सजी आँखें भी रूठ जाया करती है 
पलकों पे सजे अश्कों के दफ्तर देख आया हूँ 

इक अरसे बाद हंसा है वो तो कोई बात जरुर है 
वरना उसे सिसकते हुए मैं अकसर देख आया हूँ 

मैं डूबते हुए सूरज से शिकायत करता भी तो कैसे 'हरीश' 
हर साँझ मुस्कुराते हुए उसे अपने घर देख आया हूँ...!

Thursday, March 22, 2012

गुजरे पलों की अहमियत

मै अपनी बात करने का मिजाज़ नहीं रखता मुझे अपनों की बाते करना अच्छा लगता है। सहूलियत रहती है दुःख दर्द बाँटने में। आज फिर किसी अपने की याद आई तो लिखने बैठ गया । ना जाने क्यों गुजरे पलों की अहमियत हर रोज बढ़ती ही जाती है लोग जाने अनजाने में मिलते है बिछुड़ते है और फिर सफ़र शुरू होता है यादों का परिंदों की मानिंद मुझे भी हक था खुले आसमान में पंख पसारने का आजादी का मै भी शौक़ीन रहा हूँ ,पर हर रोज आसमान मन मुताबिक खुला नहीं मिलता विचरने को किसी न किसी दिन कमबख्त यादों के बादल आ ही जाते है कुछ भूली बिसरी यादें तो कुछ अनसुलझे शिकवें हर किसी की दिनचर्या का अहम् हिस्सा रहे है और मै तो इनसे अछूता रह ही नहीं सकता. 
मंजिलों की दूरियों से मैं वाकिफ था मगर 
हर पत्थर मेरी राह का ठोकर रहा है.....!
.....आज बस इतना ही! वक़्त मिला तो और लिखने की सोचेंगे।
   

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