''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Wednesday, May 9, 2012

खुशबू का आलम जारी है (ट्विटर पर लिखी मेरी ग़ज़ल)



तुझसे बेपनाह मुहब्बत की ये कारगुजारी है 
नादाँ बस्ती में जनाजा-ऐ-महबूब की तैयारी है 

तुझे भूल भी जाऊं मगर आज ये हालात है मेरे 
बिखरी जुल्फों में भी खुशबू का आलम जारी है 

बेफिक्र बस्ती में इक फकीर धुनी तपा के बैठ गया 
बेसुध खुदा को पाने की उसकी पुरजोर तैयारी है 

कुछ न कहना उसे वो हर बात का बुरा मानती है 
वो गज़ब की बेशकीमती है वो खुदा की दुलारी है 

खेल-ऐ-मुहब्बत में खबरदारी भी जरुरी है 'हरीश'
इसमे जीत भी करारी है इसमे हार भी करारी है 

12 comments:

  1. बहुत खुबसूरत ग़ज़ल हर शेर लाजबाब , मुबारक हो

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    1. शुक्रिया सुनील कुमार जी...!

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  2. खुबसूरत ग़ज़ल , मुबारक हो

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    1. शुक्रिया उदयवीर सिंह जी ...!

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  3. बेफिक्र बस्ती में इक फकीर धुनी तपा के बैठ गया
    बेसुध खुदा को पाने की उसकी पुरजोर तैयारी है
    बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है हरीश जी काफिया और रदीफ़ को सही लेकर चले हैं ये शेर बहुत पसंद आया

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    1. शुक्रिया राजेश कुमारीजी ...!

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  4. Replies
    1. तह-ऐ-दिल से शुक्रिया राजेशजी...आपकी बेशकीमती गवाही के लिए...!

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  5. बहुत ही बेहतरीन,,,,,शानदार गजल..
    बहुत ही बढ़िया...

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अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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