''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Sunday, May 6, 2012

मजा आ जाये (ग़ज़ल)

कुछ तो हो बहाना कि मजा आ जाये
गर तू हो करीब मेरे मजा आ जाये 

ये कोलाहल ये बेहिसाब शोर-शराबा 
शहर में हो कोई गांव मजा आ जाये 

मेरे जनाजे को सजाने से पहले उसे 
मेरी कसम याद दिला दो मजा आ जाये

तेरी नज़रों से दूर चला भी जाऊं चुपचाप                  
एक बारगी तू कह दे तो मजा आ जाये 


अब और कितना उसे याद करूं 'हरीश'
रफ्ता-रफ्ता भूल ही जाऊं मजा आ जाये 

कुछ तो हो बहाना कि मजा आ जाये
गर तू हो करीब मेरे मजा आ जाये...!

5 comments:

अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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