''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Thursday, May 10, 2012

बेक़सूर निगाहों के मसलें (ग़ज़ल)

बेक़सूर निगाहों के मसलें चश्मदीद गवाह हो गये 
हम इतना डूबे उसकी चाहत में कि दरिया हो गये 

मुहब्बत की बाँहों में सिसककर गम शुकून पाता है 
अश्कों में नहाकर बेआबरू  तमाम शिकवा हो गये

 एक बार जो उसकी खैर ली तो वो लिपट के रो पड़ा 
बातों बातों में हम भी गमे-यार के हिस्सेदार हो गये 

हर पत्थर को खंगालने की जब-जब भी चली है बात 
जाने क्यूँ बेबुनियाद मेरे शहर के मकां परेशां हो गये 

अकसर सूखे पत्ते उसी सिम्त फेंक दिए जाते है'हरीश'
जिस किसी सिम्त रवाना अश्कियाँ तूफां हो गये...!

4 comments:

  1. बहुत खूब|||
    बहुत ही बेहतरीन गजल...

    ReplyDelete
  2. एक बार जो उसकी खैर ली तो वो लिपट के रो पड़ा
    बातों बातों में हम भी गमे-यार के हिस्सेदार हो गये
    Wah wah wah

    ReplyDelete
  3. http://blondmedia.blogspot.in/


    mast gajal ,urdu shabdo ka istemaal mast ban pada hai

    ReplyDelete
  4. वाह वाह क्या बात है बहुत लिखा है आपने.... समय मिले आपको तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/ धन्यवाद....

    ReplyDelete

अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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