''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Friday, January 6, 2012

एक गुनाहगार का ख़त मूरत-ऐ-मुहब्बत के नाम...

प्रिय  मूरत-ऐ-मुहब्बत,
                     तुम्हारे भेजे ख़त की आखिरी यात्रा आज मेरे हाथों में पहुँचते ही दम तोड़ गयी। ख़त पढ़कर तेरी नादानियों पर हंसी भी आई और मेरी अतीत की कारगुजारियों पर रोना भी। खैर...अब जिक्र मैं अपने हालातों का करता हूँ...     
                     आजकल मैं अपने हिस्से के गुनाहों का बड़ी सिद्दत से ख्याल रखता हूँ। मुझे बेहद अजीज है मेरे ये गुनाह अतीत के।बस इसी खातिर सहेज के रखे है इन्हें दिल के एक मासूम कोने में। ये उस वक़्त के गुनाह है जब तू मेरे साथ हुआ करता था।मेरा अपना था। मुस्कुराना-हँसना-रातों में जगना-जगाना, सर्द हवाओं से दिल की बातें करना, परिंदों के परवाजों के गीत गाना...यही तो है वे सब मेरे अपने गुनाह! अतीत के गुनाह। शुक्र है ये गुनाह अब मुझसे नहीं किये जाते। और तुम हो की सिसकियों के सायों में आहट सी बन के रह गयी हो पदचापों की मानिंद मेरे दिल-ओ-दिमाग में। ये मेरे अपने हालात है कमोबेश शब्दों में बयान नहीं होते। तेरी अलसाई आँखों का शर्म के चक्रवातों में झुक जाना, तेरी खुशबूओं से आब-ओ-हवा का पाक-साफ़ हो जाना...मैं अब भी नहीं भूला। तेरी कसमों की चांदनी तो आज भी मेरे बटूए में है, समेटी हुयी। सहेज के रखी हुयी। अब जब भी मुहब्बत के बाज़ार से गुजरता हूँ अकसर मेरे हाथ जिनसे गुलाबों के फुल लिए थे-दिए थे गुज़रे वक़्त में, कमबख्त मेरी जेब में अतिक्रमण कर ही जाते है ताकि खरीद सकू वफ़ा की चाबी से चलने वाले खिलौनें...हँसते हुए-गाते हुए-रमते हुए खिलौनें।
                   तो क्या आज भी तेरे होंठ कंपकंपाते है मेरा नाम लेते हुए।...अच्छा है! अकसर यही होता है। जो वफ़ा की बातें बार-बार करता है वो वफ़ा एक बार भी नहीं करता।उसके अपने होंठ भी क्या साथ देंगे। इसीलिए तो  किस्तों में शब्दों की चारदीवारी खींचनी पड़ती है अपने हक के मंदिर को बेआबरू करने से पहले। मुहब्बत तो ऐसी ही होती है..क्या करें। इसमे ना तेरा कसूर है ना तेरी वफाओं का क्योकि इस बाज़ार में खुशबूओं की नीलामी तक सर-ऐ-राह हो जाती है। किस्मत की बाज़ी है, बिक जाए तो बेमोल हो जाती है और ना बीके तो बेशकीमती।
                  अब छोडो भी...!क्या रोना खुद की ही बेजा हरकतों पर।सुबह का भूला अगर भूल ही गया कि उसे शाम को घर लौटना भी है तो भूल ही जाने दो।अगली सुबह तो उसे आना ही है।पलकों का गुनाह बेकुसूर आँखे क्यों भुगते और बिचारे अश्कों का तो कोई लेना-देना भी न था।क्यों बहाते हो इन्हें फोकट में। अश्क अनमोल है जरा सम्भाल के रखो।जिंदगी बड़ी बेरहम है कब साथ छोड़ जाये कुछ पता ही नहीं चलता और अगर पता चलता तो लोग मुहब्बत ही क्यों करते? वफ़ा कि कसमें क्यों खाते? क्यों होते मुहब्बत के सलीके दरकिनार?
                    खैर मुझसे ना सही मेरे नाम से तो तेरा वास्ता अब भी है...तुम्हारे लिखे खतों से ये मालुम होता है कि तुमने मेरा ये ऐतबार आज तलक नहीं तोडा...शुक्रिया..!   
                                                                                                  तुम्हारा अपना
                                                                                                     ''गुनाहगार''

1 comment:

अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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