''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Saturday, January 7, 2012

सफ़र जिंदगी का...(शब्दों में)

महज़ एक अधकचरी किलकारी
और सफ़र शुरू
जिंदगी का...!
जीवंत सांसों का
खुले आसमानों का
रंगों का
बारिशों का
अपनों का -परायों का
होंसलों का
अफसानों का
शबनमी कली का
सफ़र जिंदगी का....!

शुरूआती सफ़र की रफ़्तार
मुकम्मल नहीं होती
लडखडाती हुई
गिरती-पड़ती हुई
अँगुलियों के सहारे चलने वाली
रोते-हँसते हुए सिखने वाली
होती है रफ़्तार
और अनुभव भी कच्चा होता है
जैसे बुलबुलों का हार...!

सफ़र आगे बढ़ता है
शब्दों-अक्षरों में खो जाने को
किताबों में गैर जिंदगियां  पढता है
हंसती हुयी- बिलखती हुयी
खुद को रफ़्तार देने के लिए
कुछ सीखना पड़ता है...!

एकाएक सफ़र के 
अधूरे होने का आभास होता है
हमसफ़र की तलाश रहती है
मस्ती रहती है
मौज रहती है
उतार-चढाव
टेढ़े-मेढे मोड़ों की तादात रहती है
हमसफ़र के साथ
फिर रफ़्तार बुलंदीयों पर
ऊँचे आसमानों पर रहती है
नयी शाखें,नयी कलियाँ फूटती है
खुशबू से ओतप्रोत
गुलाब बनने को
और सफर बढ़ता है 
वक़्त की आजमायिशों पर...!

रफ्ता-रफ्ता
सफ़र फिर लडखडाता है
मगर थामने के लिए
अब अंगुलियाँ नहीं होती
छड़ियाँ होती है
सांसें अटकने का आभास होता है
जिंदगी का आलिशान महल
अनुभवों की बिरादरी के साथ
ढहने को होता है
इस तरह जिंदगी का सफ़र ख़त्म होता है
शून्य में...!

3 comments:

  1. Wah,Behtareen...

    Puri zindagi ka safarnama prastut kar diya aapne to...bahut khoob

    www.poeticprakash.com

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।
    आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....!

    ReplyDelete
  3. धन्यवाद @प्रकाशजी...@भास्करजी....

    ReplyDelete

अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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