''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Sunday, January 8, 2012

गर तू खुशबू का शौक रखता है...!

समंदर भी हूँ दरिया भी हूँ गर तू डूबने का शौक रखता है
खुली किताब की तरह हूँ मैं गर तू पढने का शौक रखता है

ये नौबत भी आएगी इक दिन कि रह न पायेगा मेरे बगैर
मैं गुलाब बन जाऊंगा गर तू खुशबू का शौक रखता है



सिलसिला जारी है मेरा आग से मुलाकातों का आजकल
मैं मुहब्बत बन जाऊंगा गर तू जलने का शौक रखता है


मुशायरों से वाकिफ हूँ तालियों कि तिस्नगी भी जानी है
मैं ग़ज़ल बन जाऊंगा गर तू गुनगुनाने का शौक रखता
है 


होश में आने के लिए मैं अकसर अकेले ही शराब पीता हूँ 'हरीश'
मैं हुजूम-ऐ-मस्ती बन जाऊंगा गर तू मैखाने  का शौक रखता है

6 comments:

  1. होश में आने के लिए मैं अकसर अकेले ही शराब पीता हूँ 'हरीश'
    मैं हुजूम-ऐ-मस्ती बन जाऊंगा गर तू मैखाने का शौक रखता है

    अच्छी रचना...अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं..लाजवाब पोस्ट |

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  2. उम्दा गज़ल. हर शेर पर दाद है.

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  3. वाह ...बहुत खूब

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  4. वाह वाह हर शेर खुबसूरत शेर दाद को मुहताज नहीं , बहुत खूब

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  5. शुक्रिया दोस्तों....!
    कमसिन है मेरे शब्द मेरी सुनते नहीं...इश्क की बातें करू तो खुद मुझे चिढाने लग जाते है...

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  6. बहुत खूब
    लाजवाब शेर.

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अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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