''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Saturday, January 7, 2012

नयी ग़ज़ल--'' पत्थर की मूरत हूँ मैं प्रेम कर या सजदा कर...!''

हो सके तो माफ़ कर या खुद अपने को जुदा कर
पत्थर की मूरत हूँ मैं प्रेम कर या सजदा कर

और कितनी बातें करोगे रूठने मनाने की पर्दों में
वक़्त की ये आरज़ू है अपने आप को बेपर्दा कर

हक की जागीर पत्थरों पे खुदवाने से क्या होगा
बेशकीमती मुहब्बत है तेरी गैरों को फायदा कर

बहुत खा ली है कसमे दिल लगाने की पशोपेश में
अब कुछ यूँ कर कि कसने न खाने का वादा कर

बेशक मुझसे जुदा होकर भी तू जी न पायेगा 'हरीश'
आ बैठ मुझसे अपनी दो-चार साँसों का सौदा कर

हो सके तो माफ़ कर या खुद अपने को जुदा कर
पत्थर की मूरत हूँ मैं प्रेम कर या सजदा कर...!

6 comments:

  1. बहुत खा ली है कसमे दिल लगाने की पशोपेश में
    अब कुछ यूँ कर कि कसने न खाने का वादा कर ...वाह

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया...!
    मुहब्बत के सितारे है मेरी कैद में जब जी चाहता है आसमान में एक-दो उछल देता हूँ...!

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  3. उम्दा सोच
    भावमय करते शब्‍दों के साथ गजब का लेखन ...आभार ।

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  4. शुक्रिया भास्करजी....
    आज कुछ इसी हवाएं चली है मेरे शहर में कि हर शख्श पगलाया सा है

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  5. बहुत खा ली है कसमे दिल लगाने की पशोपेश में
    अब कुछ यूँ कर कि कसने न खाने का वादा कर...
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति....
    ये कसने का मतलब क्या है....क्या ये कसमे है....
    बधाई.....

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अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...

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