''आज़ाद है मेरी परछाई मेरे बगैर चलने को,,,मै नहीं चाहता मेरे अपनों को ठोकर लगे...ये तो 'वर्तमान की परछाई' है ऐ दोस्त...जिसकी कशमकश मुझसे है...!© 2017-18 सर्वाधिकार सुरक्षित''

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Tuesday, December 27, 2011

दो शब्द

जी हां दोस्तों
ये दो शब्द जो लबों की सुर्ख़ियों में बहते झरने की गुन्जायिशे-आवाज़ को अवाम से रूबरू करवाने का बुलंद हौसला लिए हुए प्रस्फुटित हुए होते है बयां करते है जुनुने- मुहब्बत के अफ़साने जो उपजे है ख़ामोशी की बहार में झूमते तिनके की नोक पर ठहरे शबनम की दुआ से...बयां करते है जिंदगी के उस वक़्त को जो अपने पदचिन्हों की आहात सुनकर अपना रास्ता खुद तलाशता है पथरीली बेनूर घाटियों की साँसों क बिच के ठहराव पर, वो ठहराव जो आज भी चलने से कतराता है अश्को से सजी राह पर....ये दो शब्द जो अजीज यारों की बेनूर जिंदगानी को मिश्किलातों से निजात दिलाने के वास्ते ताउम्र खामोश दीवारों से कैद मजार पर अश्को की जुबानी खुदा से यही दुआ करते हुए नज़र आते है की ''या रसूलल्लाह या गौस मेरे अल मदद''

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अरे वाह! हुजुर,आपको अभी-अभी याद किया था आप यहाँ पधारें धन्य भाग हमारे।अब यहाँ अपने कुछ शब्दों को ठोक-पीठ के ही जाईयेगा मुझे आपके शब्दों का इन्तेजार है...


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